ग़ज़ल
छत्तीसगढ़ी
कौन हाँसही, कौन ह गाही,
कौन हर अपन धरम निभाही।
नाव बिना, पतवार बिना जी,
कौन हर गंगा ल नहकाही।
जग के खेवनहार जउन हे,
उनला केंवट पार लगाही।
सपट के बइठे इहाँ सिकारी,
कइसे पंछी मन हर गाही।
सबके सब बइठांगुर हे तब,
सरहद कौन लड़े बर जाही।
बलदाऊ राम साहू
सपट= छुपकर, बइठांगुर= निकम्मा।
छत्तीसगढ़ी
कौन हाँसही, कौन ह गाही,
कौन हर अपन धरम निभाही।
नाव बिना, पतवार बिना जी,
कौन हर गंगा ल नहकाही।
जग के खेवनहार जउन हे,
उनला केंवट पार लगाही।
सपट के बइठे इहाँ सिकारी,
कइसे पंछी मन हर गाही।
सबके सब बइठांगुर हे तब,
सरहद कौन लड़े बर जाही।
बलदाऊ राम साहू
सपट= छुपकर, बइठांगुर= निकम्मा।
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