Monday, 22 June 2015



हम तो ठगे हुए हैं

स्वर्णमृग पा लेने के
सपने सजे हुए हैं।
मरूभूमि में मृगतृष्णा-सी
हम तो ठगे हुए हैं।
राजनीति की कंठीमाला
यूँ सबको भरमाते
जो भी लेता उसे हाथ में
वे शीश तक डूब जाते
इसकी माया अदभुत है
सभी फँसेे हुए हैं।
अवसरवादी आते-जाते
मिथ्या राग अलापें
चिकनी-चुपड़ी बातें करके
उल्टा काठा नापें
लालच के इस महापंक में
पूरे धँसे हुए हंै।
रामायण से महाभारत तक
इसकी कथा पुरानी
न कोई है दद्दा-भैया
रिश्ते सभी बेमानी
तार-तार सब संबंधों के
उलझे पड़े हुए हैं।
@बलदाऊराम साहू

3 comments:

  1. वर्तमान राजनीति का काव्य की भाषा में अच्छा विष्लेषण ।

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  3. इसी तरह स्नेह बना रहे। प्रतिक्रिया के लिए आभार ।

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