खोता बचपन, बढ़ती चिंताएँ
बच्चों की कुछ सहज प्रवृत्तियाँ होती हैं। वे उन्हीं प्रवृत्त्यिों के आधार पर क्रियाएँ करते हैं। उनमें कुछ जिज्ञासाएँ होती हैं, जो उन्हें समस्त ब्रह्मांड को जानने के लिए उत्प्रेरित करती हैं। इसीलिए वे हर किसी वस्तु को छूकर देखते-परखते हैं। उनके मन में कुछ ऐसे प्रष्न कुलबुलाते हैं, जिन्हें जानने के लिए वे अपने बड़ों से पूछते हंै। उनके प्रश्नों के सहज हल नहीं मिलने पर वे कुछ नई क्रियाएँ करते हैं। ये क्रियाएँ बड़ों के लिए भले ही असहज और बेवकूफीपूर्ण हों, पर अपने प्रश्नों के समाधान तक पहुँचने के लिए उनकी यह सहज प्रवृत्तियाँ निरंतर क्रियाशील होती हंै। बाल-साहित्यकार श्री कृष्ण शलभ लिखते हैं-‘‘बाल-सुलभ प्रवृत्तियों में प्रमुख प्रवृत्ति है बाल-जिज्ञासा। बच्चा हर पल, हर घड़ी प्रश्नातुर रहता है। सारा ब्रह्मांड उसके लिए प्रष्न है। प्रश्न, हल और आगे प्रष्न उनकी उँगलियों पर रहते हैं।’’
वास्तव में ये बाल-सुलभ प्रवृत्तियाँ ही बचपन का आधार हैं। उनका विस्तार ही उसे एक सफल व्यक्तित्व बनने के लिए पे्ररित करता है। अपनी जिज्ञासाओं पर हस्तक्षेप उसे निरुत्साहित ही नहीं करता बल्कि उसके भीतर नकारात्मक दृष्टिकोण भी पैदा करता है। उनकी खेल-क्रियाओं में भी उनकी सृजनात्मकता दिखती है। वे अकेले में या अपने साथियों के साथ खेलते हुए तरह-तरह की क्रियाएँ करते हैं, जो उनके भीतर की अंतश्चेतना होती है। बच्चों की इन क्रियाओं के देखकर कभी-कभी हम अचंभित भी होते हैं। हमें ऐसा लगता है कि इन क्रियाओं को इन्होंने कैसा और कहाँ से जाना होगा। ऐसी ही बचपन की बहुत सी क्रियाएँ होती हंै जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता और वे स्मृतियों में बनी रह जाती हंै।
ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं होगा जिसकी स्मृतियों में बचपन की यादें न हों। हर कोई अपने बचपन के खुषनुमा पलों को याद करता है और उनमें खो जाना चाहता है। बचपन की वे शरारतें, खेल-खिलौने, संगी-साथी, सबके-सब अपनी ओर आकर्षित करते हैं। और आकषर््िात करें भी क्यूँ न? यही सब तो बचपन को यादगार बनाते हैं। सहज, चंचल, निश्छल स्वभाव, राग-द्वेष से परे, लोभ, संकोच से मुक्त जीवन बड़े होने पर फिर कहाॅं? निर्भय और निर्मुक्त, चिंताओं से कोसों दूर, बेपरवाह जीवन बचपन के बाद और कभी नहीं मिलता। मात्र चाहत ही रह जाती है कि काश, वह बचपन फिर लौट आता। पर यह संभव नहीं होता।
आज से लगभग दो दशक पूर्व के बचपन और आज के बचपन में जो बदलाव आया है वह हम सबको चिंता में डाल रहा है। क्योंकि आज बचपन का मतलब ही कहीं खोते जा रहा है और चिंताएँ लगातार बढ़ती जा रही हंै। आज बच्चे के जन्म से पहले ही माता-पिता अपने बच्चे के भविष्य को लेकर चिंंितत होने लगे हैं। यह चिंता बच्चे के जन्म के बाद उनमें आरोपित होने लगती है और इसी गुणा-भाग में बचपन विलोपित होता चला जाता है। बच्चों की सहज खेल-क्रियाएँ भी प्री-प्लांड होने लगी हंै। कौन-सा खेल बच्चे के मानसिक विकास में सहायक होगा, उसे किस तरह के खिलौने दिए जाएँ आदि माता-पिता की अपनी रुचियों और समझ पर निर्भर करता है और उसी के आधार पर इनका चयन होता है। चाहे उसमें बच्चों की रुचि हो या न हो, उससे उनका कोई सरोकार नहीं होता। इस तरह हम देख पा रहे हैं कि बच्चे अब उन्मुक्त और सहज खेल-क्रियाओं सेे दूर होते जा रहे हैं।
बचपन में खेले जाने वाले छूप-छाँव, रेसटीप, छू-छूवाउल, पिट्ठूल, डंडा-पचरंगा, कबड्डी, खो-खो, फोदा, रस्सी दौड़, फुगड़ी, लंगड़ीकूद, बिल्लस आदि आँचलिक खेल केवल बच्चों के मनोरंजन के साधन मात्र नहीं होते थे, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक विकास के साथ सामाजिक विकास में भी सहायक थे। बच्चे इन खेलों के माध्यम से कई तरह से योजना बनाने की कला में प्रवीण होते थे, आपस में रूठते-मनाते थे, यही नहीं उनके बहुत से खेलों में तो समाज का यथार्थ रूप भी देखने को मिल जाता था। छत्तीसगढ़ में खेले जाने वाले सगा-पहुना के खेल में पारिवारिक जीवन का यथार्थ चित्रण होता था। ये तमाम क्रियाएँ उनके भावी-जीवन के लिए कहीं न कहीं मददगार होती थीं।
आज के पढ़े-लिखे माता-पिता अपने बच्चों को इन मौलिक और देशज खेलों से दूर करते जा रहे हैं। वे प्रकृति से दूर रखकर बच्चों के समग्र विकास की परिकल्पना कर रहे हैं। वे अपने बच्चों से इतना प्यार(?) करते हैं कि जिसकी परिकल्पना नहीं की जा सकती। वे नहीं चाहते कि उनके बच्चे मिट्टी से खेलें, उनके हाथ धूल से सनंे, उनके कपड़े गंदे हों। उन्हें यह डर होता है कि कहीं मिट्टी से खेलने से उनके बच्चों को ‘इंफेक्शन’ न हो जाए। वे इन खेलों को खेलना पिछड़ेपन की निषानी मानते हंै। नन्हे बच्चों को जमीन पर बैठने भी नहीं देते। ‘बेड’ पर ही उन्हें खिलौने दे दिए जाते हैं और परिकल्पना की जातीे है कि उनका बच्चा शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहे, माटीपुत्र बने, पर माटी से खेले बिना माटीपुत्र बनने की बात समझ से परे लगती है।
आज का युग ज्ञान-विज्ञान का युग है। माता-पिता चाहते हंै कि उनका बच्चा वैज्ञानिक बने, डाॅक्टर, इंजीनियर बने, अच्छा आदमी भले ही न बन पाए। इसीलिए वे उन्हें होश सँभालते ही कम्प्यूटर थमा देते हैं। बच्चे खिलौने के बजाय कंयूटर से दोस्ती कर लेते हैं। कंयूटर के धूम-धडाक वीडियो गेम ही उनका प्रिय खेल हो जाता है। इसके अतिरिक्त मोबाइल बंदूक, तोप, रोबोट आदि आधुनिक खिलौने उनकी खेल- सामग्री होती हैं। बंदूक से खेलकर महामानव बनने की परिकल्पना कैसी?
बच्चा आस-पास के परिवेष और समाज से परिचित भी नहीं हो पाता और उसकी नई जिंदगी की शुरुआत हो जाती है। जैसे-तैसे बच्चा ढाई-तीन साल का होता है, तो माता-पिता को उसकी शिक्षा की चिंता होने लगती है। महँगे-से-महँगे स्कूल या बोर्डिंग में उसे भर्ती करा दिया जाता है और यहीं से उसका बचपन छिनने लगता है। पढ़ाई और केवल पढ़ाई के चक्कर में बच्चा, बच्चा नहीं रह पाता, वह कोल्हू का बैल हो जाता है। स्कूल और घर दोनों ही जगह उससे केवल पढ़ने की बात होती है। होमवर्क के बोझ तले वह दब जाता है। पढ़ाई के चक्कर में माता-पिता और स्कूल बच्चों को जीवन की शिक्षा देना ही भूल जाते हैं। शायद इसीलिए बच्चे आगे चलकर जीवन को सही प्रकार से नहीं जी पाते। वे भौतिक उपलब्धियाँ भले ही हासिल कर लेते हों किंतु मानवीय संवेदनाओं से दूर चले जाते हैं।
वर्तमान में किशोरों में अवसाद और तनाव बढ़ता जा रहा है, इसका कारण उनके बचपन का छिन जाना ही है। बच्चे के जन्म से ही माता-पिता की बड़ी-बड़ी अपेक्षाएँ होती हैं, जो उनके भीतर कुंठा पैदा करती हंै। जब वे माता-पिता की अपेक्षाओं में खरे नहीं उतरते तब वे हीन-भावना से ग्रस्त हो जाते हैं। परिणामस्वरूप बच्चे गलत राह की ओर अभिमुख हो जाते हैं। वे असंवेदनशील हो जाते हैं। यही नहीं किशोरों में दिनोंदिन आत्महत्या करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, जो वर्तमान समाज के लिए बहुत बड़ी चिंता का विषय है। इसलिए वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए समाज को अपनी सोच में बदलाव की जरूरत है।
यह सच है कि आज समाज के सभी मानक बदले हैं। मानवीय आवश्यकताएँ बदली हैं। इसी कारण आज के मानव के चिंतन में भी बदलाव आया है। वह अर्थोपार्जन की मषीन बनता चला जा रहा है। इस प्रक्रिया में उनकी संवेदनाओं की नदियाँ सूखती जा रही हैं और हिंसक प्रवृत्तियाँ प्रबल होती जा रही हंै। बाल-साहित्य समीक्षक लक्ष्मीनारायण रंगा लिखते हैं-‘‘उपभोगतावादी विचारधारा ने हमें परार्थ से स्वार्थ की ओर दृष्टि दी है और हम प्रेम, करुणा, दया ममता, भाईचारा, स्नेह, शांति, सहयोग सब कुछ भूलकर सोने की आँखंे और प्लेटेनियम के दिल का टान्सप्लांटेशन करा रहे हैं और मानवता मर रही है।’’
ऐसे संक्रमणकाल में पल रहे बचपन को खोने से कैसे बचाएँ, इस पर आज विचार करने की आवश्यकता है। चिंतन की प्रक्रियाओं में बदलाव की जरूरत है। बचपन को बचाने के लिए मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास करने की जरूरत है। आशावादी दृष्टिकोण को नए संदर्भ देने की जरूरत है। एक पुल बनाने की आवश्यकता है जिससे वर्तमान की आवश्यकताएँ, भविष्य की चिंताएँ और बचपन को बचाने के लिए एक राह बनाई जा सके। तेजी से बदलते सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेष को वर्तमान पीढ़ी के माध्यम से संरक्षित किया जा सके। डाॅ सुमन बिस्सा कहती हैं-‘‘बालक एक विकासमान चेतन अंश है, उसकी अपनी स्वतंत्र संभावनाएँ हैं, जिसे वह प्रमाणित करना चाहता है। फिर क्यों न उस चेतनशील प्राणी को वही बनने दिया जाए जो वह बनना चाहता है।’’
बलदाऊ राम साहू
सहायक संचालक
आदिम जाति अनुसूचित जाति विकास ,नया रायपुर छत्तीसगढ़ ई मेल -brscert@yahoo.in
मो. 09407650458
समाज की सोच में बदलाव आने जरूरी हैं ... आने वाले समाज के निर्माण की नीव इसी बात पे रक्खी जानी है की हम कितने संवेदनशील हैं इंसानियत के प्रति ... सार गर्भित आलेख ...
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